Bihar Caste Census 3 : किन्नर पूरी दुनिया में भले हों Third Gender, मगर बिहार में अब यह जाति- नंबर 22


इनकी जाति का भी कोड है- नंबर 22
– फोटो : अमर उजाला

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सदियों से किन्नर, कोथी, हिजड़ा, ट्रांसजेंडर…कहते-कहलाते इन्हें पूरी दुनिया ने पुल्लिंग-स्त्रीलिंग से अलग तीसरे लिंग, यानी Third Gender के रूप में स्वीकार किया। अबतक बिहार में भी यही स्वीकार्यता थी। लेकिन, 15 अप्रैल से शुरू हो रही जातीय जनगणना के प्रगणक अपने रिकॉर्ड में थर्ड जेंडर को जाति के रूप में दर्ज करेंगे। मतलब, थर्ड जेंडर के शख्स का जन्म भले किसी भी जाति में हुआ हो- उसके लिए इस जातीय जनगणना में जाति ही ‘किन्नर / कोथी / हिजड़ा / ट्रांसजेंडर (थर्ड जेंडर)’ होगी। अंग्रेजों के जमाने के बाद बिहार में पहली बार हो रही इस जातीय जनगणना में इन्हें लिंग से नहीं, बल्कि इस जाति से पहचान दी गई है। बाकी की तरह, इनकी जाति का भी कोड है- नंबर 22

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सरकार कठपुतली मान रही है किन्नरों को

कोड निर्धारण के साथ जैसे-जैसे जातीय जनगणना की जानकारी फैल रही है, किन्नरों का बड़ा वर्ग इसके खिलाफ खड़ा होने की तैयारी कर रहा है। किन्नरों के समूह ने बिहार में जातीय जनगणना की सुगबुगाहट के समय ही कहा था कि सरकार एक सामाजिक अपराध करने जा रही है। बिहार में किन्नरों की सर्वमान्य प्रतिनिधि और मुखर लेखक-वक्ता रेशमा प्रसाद का सवाल तीखा, मगर मौजूं है। वह पूछती हैं कि जाति का निर्धारण जब जन्मदात्री मां या पालक पिता से होता है तो कोई सरकार उसके लिए अलग जाति की व्यवस्था कैसे कर सकती है? वह कहती हैं कि सरकार कभी हमें पिछड़ा वर्ग में रखने का झांसा देती है तो कभी हमारे लिए एक जाति का ही निर्माण कर देती है, जैसे हम कोई कठपुतली हों। जाति और जातिगत कोड का निर्धारत तो सरासर सामाजिक और कानूनी अपराध है।

जन्म से जाति, जाति से मिला हक छीना जा रहा

रेशमा प्रसाद देश की पहली ट्रांसजेंडर हैं, जिन्हें किसी नगर निगम ने अपना ब्रांड एंबेसडर चुना। रेशमा ट्रांसजेंडर समुदाय के हक के लिए लंबी लड़ाई लड़ रही हैं। वह कहती हैं कि बिहार सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय को उच्चतम न्यायालय के आदेश का हवाला देकर पिछड़ा वर्ग में शामिल किया और अब उसे ही जाति के रूप में जाति जनगणना में रखा जा रहा है। साथ ही, वह एक अहम सवाल उठाती हैं- “कोई ट्रांसजेंडर शख्स जन्म से अनुसूचित जाति-जनजाति (SC-ST) से हो और आप उसे इस तरह ‘किन्नर’ जाति में घेरकर पिछड़ा वर्ग में रखते हुए जाति जनगणना करते हों तो यह अपराध नहीं है? यह तो उससे एससी-एसटी के आरक्षण का अधिकार छीनना हो गया। इसी तरह, क्या अगड़े परिवार में ट्रांसजेंडर पैदा नहीं होते? उन्हें ‘किन्नर’ जाति में रखते हुए पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का लाभ देना कैसे सही हो सकता है?”

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लाभ देने हो तो ऐसी जनगणना का अर्थ नहीं

ट्रांसजेंडर समुदाय के कई शख्स ने इस सवाल पर ‘अमर उजाला’ के सामने अपनी बात रखी। अपनी पहचान छिपाते हुए किन्नरों ने कहा कि सरकार जातिगत जनगणना करा वंचितों को उनका हक दिलाने की बात कर रही है, लेकिन सदियों से हम हर अधिकार से वंचित हैं। हर लाभ से वंचित रहे हैं। हमारे लिए तो कुछ गणना की जरूरत नहीं थी। जरूरतमंदों की गिनती नहीं, यह अपनी जरूरत के लिए की जा रही गिनती है। किन्नरों ने कहा कि कर्नाटक की तरह बिहार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को या तो अलग से 1% आरक्षण निर्धारित किया जाना चाहिए या सभी वर्गों में 1% आरक्षण किन्नरों के लिए होना चाहिए।



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